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रेकी की सिखलाई

रेकी विद्या का ज्ञान गुरू शिष्य प्रणाली से एक गरैंड मास्टर द्वारा दिया जाता है। रेकी की दीक्षा देने का प्रावधान होता है। रेकी क्योंकि सर्व-व्यापी है। इस लिए इसका समावेश हम सब में है। जरूरत बस इस बात की है कि कोई सही जानकार हमें इसकी शिक्षा योग्य ढंग से दे सके, यही काम बस एक गरैंडमास्टर करता है। इस प्रणाली को दीक्षा देना (प्दपजपंजपवदध्।जजनदमउमदज) कहा जाता है।
ये दीक्षा जब शिष्य सामने बैठा हो अथवा सामने ना होने की सूरत में भी (दूर स्थान होने पर भी) दी जा सकती है।
दीक्षा प्रदान करने का ढंग एक गुप्त प्रणाली है। गुरू ज्ञान का वाहिक है, शिष्य पात्र है। दीक्षा उपरान्त शिष्य आभार वश गुरू के चरण स्पर्श करता है तथा उसके प्रति अपनी आस्था एवं श्रद्धा प्रगट करता है। गुरू उसे यशस्वी होने का आर्शिवाद देता है।
दीक्षा उपरान्त शिष्य ब्रह्मिण्डीय ऊर्जा का वाहिक (बींददमस) बन जाता है। वह रेकी का आवाह्मन करने योग्य हो जाता है। सीमित दिनों के अथ्भ्यास के बाद वह जरूरत मंद लोगों को अपने द्वारा उनकी आवश्यकता अनुसार रेकी देने योग्य हो जाता है।
डा. ऊसूई ने अपने समय में इस विद्या का अच्छे ढंग से प्रचार और प्रसार किया। इस क्षेत्र में समाजिक भलाई के लिए डा. ऊसूई ने अत्यधिक काम किया। 1923 में जापान में आये भूचाल के समय उनके काम की प्रशन्सा हेतु उस समय के शासक ने उनको सम्मानित भी किया। अपने आत्म बल को बनाये रखने के लिए उन्होनें पाँच नियमों को आदर्श माना और अपनायाः-
1. केवल आज के दिन मैं चिंता नहीं करूंगा।
2. केवल आज के दिन मैं क्रोध नहीं करूंगा।
3. केवल आज के दिन मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करूंगा।
4. केवल आज के दिन मैं अपने माता-पिता, बड़ों तथा गुरूओं का सत्कार करूंगा।
5. केवल आज के दिन मैं सभी के प्रति धन्यवादी रहूंगा।
दीक्षा के बाद यह शक्ति जीवन भर के लिए हर समय उस व्यक्ति के साथ रहती है, जो इसको प्राप्त करता है। इस शक्ति को प्राप्त करने से आप अपना तथा दुसरों का उपचार करना सीख सकते है। इस ऊर्जा से हम दूर बैठे मरीजों का भी उपचार भी कर सकते हैं। जो केवल इस थैरेपी से ही संभव हो सकता है। रेकी अलग अलग पड़ावों में सीखी जाती है। जिसे डिग्री भी कहा जाता है।
हमारे चैनल में पहली डिग्री और दूसरी डिग्री इकट्ठी प
1) पहली डिग्री 2) दूसरी डिग्री 3) तीसरी डिग्री
4) मास्टर डिग्री 5) गरैंड मास्टर डिग्री

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