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व्याधियाँ एवं शरीर के चक्र

चक्र संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है पहिया। मानव शरीर के छोटे, मध्यम एवं प्रमुख कुल मिलाकर 48 चक्र हैं, जिसमें से सात बड़े (मेजर) चक्र हैं। ये लगातार घूमते हुए ऊर्जा केन्द्र हैं जो (औरा) प्रभामंडल के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग है। जिस प्रकार स्थूल शरीर के छोटे – बड़े अंग, सभी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं उसी प्रकार प्रभामंडल के महत्त्वपूर्ण चक्र अपना – अपना कार्य करते हैं। शरीर में कुल सात प्रमुख चक्र हैं, प्रत्येक चक्र करीब 4 इंच व्यास के होते हैं। स्थूल शरीर में सात अन्तःस्रावित ग्रन्थियाँ (इन्डोक्राइन ग्लैंडज़) हैं जो शरीर के रासायनिक कारखानों के रूप में कार्य करती हैं। प्रत्येक अन्तःस्रावित ग्रन्थियों के ऊपर एक प्रमुख चक्र है जो शरीर के संवेदनशील एवं प्रमुख अंगों के कार्यों को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित, उसी प्रकार करते हैं, जैसे विद्युत – उत्पादन केन्द्र (पावर स्टेशन) विद्युत ऊर्जा की आपूर्ति कर कल -कारखानों को चलाते हैं। जब ये विद्युत – उत्पादन केन्द्र (चक्र) किन्हीं खराबियों के कारण अपना कार्य समुचित ढंग से नहीं कर पाते हैं तो शरीर के संवेदनशील एवं प्रमुख अंगों को समुचित ऊर्जा प्राप्त नहीं होती और वे अपना कार्य करने में अक्षम हो जाते हैं। प्रभामंडल से ऊर्जा सोखकर उसे शरीर के भिन्न भिन्न अंगों में उनकी आवश्यकतानुसार वितरित करते हैं। ये चक्र सम्पूर्ण स्थूल शरीर को नियंत्रित करते हुए उन्हें ऊर्जान्वित करते हैं जिससे शरीर के सभी अंग अपना-अपना कार्य उचित रूप से करते रहें, इसके साथ ही ये चक्र अन्तःस्रावित ग्रन्थियों (इन्डोक्राइन ग्लैंडज़) के कार्यों को भी नियंत्रित करते हुए उन्हें भी ऊर्जान्वित करते हैं। यदि अन्तःस्रावित ग्रन्थियों में कोई खराबी आ गई है तो संबधित चक्र को क्रियान्वित कर उस खराबी को दूर किया जा सकता है।
शरीर के प्रमुख चक्र:-

  1. मूलाधार चक्र (रूट चक्रॅ, रंग-लाल)ः- रीढ़ की हड्डी जहाँ समाप्त होती है मलद्वार के समीप यह चक्र स्थित है। सम्पूर्ण स्थूल शरीर को यह चक्र नियंत्रित, संयत, ऊर्जान्तिव एवं शक्ति प्रदान करता है। इसके साथ ही यह चक्र शरीर की मांसपेशियों, अस्थिरपंजर को भी नियंत्रित करते हुए उन्हें ऊर्जान्वित करता है। रीढ़ की हड्डी, रक्त का उत्पादन, एड्रीनल ग्रन्थि, शरीर की कोशिकाओं एवं आंतरिक अंगों को भी नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। प्रजनन अंगों को भी यह चक्र प्रभावित करते हुए उन्हें ऊर्जा प्रदान करता है। यह मूलाधार चक्र शरीर की उष्णता, स्फूर्ति, शिशुओं एवं बच्चों के विकास को भी प्रभावित करता है। मूलाधार चक्र जब असन्तुलित और कमजोर पड़ जाता है तो शरीर को हड्डी रोग (अर्थराइटिस), रीढ़ की हड्डी, रक्त विकार, ल्यूकोमिया, कैंसर, एलर्जी संबंधी व्याधियाँ धर दबोचती है। इस चक्र की दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के कारण शारीरिक विकास में बाधा, शारीरिक कमजोरी, घावों के भरने में बाधा एवं टूटी हुई अस्थियों के जुड़ने में बाधा पड़ती है। पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति एवं बलशाली व्यक्तियों का मूलाधार चक्र अत्यंत क्रियाशील रहता है वहीं कमजोर एवं दुर्बल व्यक्तियों में मूलाधार चक्र की शक्ति क्षीण रहती है।
    वृद्धावस्था में व्यक्ति का मूलाधार चक्र कमजोर पड़ने लगता है जिसका प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है, रीढ़ की हड्डी कमान की तरह झुकने लगती है, सिकुड़ती जाती है एवं तरह तरह की व्याधियाँ अस्थि, रक्त संबंधी विकार एवं अथ्राइटिस से ग्रसित हो जाती हैं। अंग्रेजी में मूलाधार चक्र को रुट चक्र कहते हैं। इस चक्र का महत्व इसी बात से समझा जा सकता है कि जिस प्रकार छोटे – बड़े पेड़ों की जड़ें पेड़ को संभाल कर रखती है, आँधी, तूफान में उसे गिरने नहीं देती, उसी प्रकार मानव शरीर में यह चक्र स्थिरता प्रदान करता है। जैसे ही पेड़ की जड़ें कमजोर पड़ जाती हैं पेड़ धराशायी हो जाता है उसी प्रकार मानव शरीर में मूलाधार चक्र के कमजोर पड़ने पर शरीर लड़खड़ा जाता है। इस चक्र का रंग लाल है।
  2. स्वाधिष्ठान चक्र (हारा अथवा सैकरल चक्र, रंग-नारंगी)ः- नाभि से कुछ नीचे पेडू में यह चक्र स्थित है। इसे सेक्स चक्र भी कहते हैं। यह चक्र शरीर के प्रजनन अंगों एवं मुत्र थैली को नियंत्रित करते हुए उन्हें ऊर्जा प्रदान करता है। इस चक्र के कमजोर पड़ने से सेक्स एवं मुत्र संबंधी विकार पनपने लगते हैं। यह चक्र हमारी जाग्रत चेतना का भी पोषक है, व्यक्ति हर समय कितना सजग, चैतन्य एवं जाग्रत है इस चक्र की क्रियाशीलता पर निर्भर करता है। सन्तान उत्पत्ति, सेक्स भावनाओ को यह चक्र नियंत्रित करता है सामने से इस चक्र पर रेकी देते समय ध्यान रहे कि पाँचों उँगलियाँ आपस में मिली हुई होनी चाहिए तथा अँगूठे का स्पर्श नाभि से होना चाहिए।
  3. मणीपुर चक्र (सोलर प्लेक्सस चक्र, रंग-पीला)ः- नाभि के कुछ ऊपर शरीर के आगे एवं पीछे दोनों ओर यह चक्र स्थित है। यह चक्र शक्ति एवं बुद्धिमता का प्रतीक है। यह चक्र शरीर के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंगों को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है और इस चक्र के असन्तुलित एवं कमजोर पड़ने से संबंधित अंगों में रोग -व्याधि विकार होते हैं। चक्र आगे की ओर से पैन्क्रियाज, लीवर, पेट, बड़ी एवं छोटी आँत, एपेन्डिक्स, फेफड़ों, हृदय एवं शरीर की स्फूर्ति को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। यह चक्र नाभि के कार्यों को भी नियंत्रित करता है जहां एक प्रकार का ‘रासायनिक प्राण’ बनता है जो प्राणशक्ति से भिन्न है। यह रासायनिक प्राण शक्ति सोखने, वितरण करने एवं ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता है। व्यक्ति के नकारात्मक मनोभाव एवं विचार मणीपुर चक्र को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। विशेषकर क्रोध, कटुता की भावनाओं के लगातार बने रहने के कारण मणीपुर चक्र कमजोर पड़ने लगता है जिसके कारण लीवर की कार्यक्षमता घटने लगती है। व्यक्ति को पेट, आंत संबंधी विकार बराबर बने रहते हैं जिसके कारण अनपच, कब्जियत, गैस्ट्रिक एवं वायु विकार बढ़ने लगते हैं। जब व्यक्ति का मणीपुर चक्र शक्तिशाली रहता है तो व्यकित बलवान रहता है एवं बाहरी आक्रमण जैसे कीटाणु, जीवाणु, बैक्टिेरिया एवं वाइरस का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता है।
    मणीपुर चक्र शरीर में ऊर्जा के पोस्ट ऑफिस का भी काम करता है। ऊपरी एवं निचले चक्रों से सूक्ष्म ऊर्जा इसी चक्र के माध्यम से आवागमन करती है। इस प्रकार यदि मणीपुर चक्र को रेकी द्वारा अधिक समय तक ऊर्जा दी जाये तो पूरा शरीर धीरे धीरे ऊर्जान्वित हो जाता है, अतएव यह सुझाव दिया जाता है कि खाली समय, सफर के दौरान मणीपुर चक्र पर रेकी देने की आदत डालनी चाहिए। यह चक्र शरीर की गर्मी एवं ठंडक देने की प्रक्रिया को प्रभावित करता है। इस चक्र की दोषपूर्ण कार्य प्रणाली के कारण शरीर में विभिन्न रोग व्याधियाँ जैसे लीवर के रोग, हृदय रोग, अलसर एवं मधुमेह पनपने लगते हैं। सामने से इस चक्र पर रेकी देते समय ध्यान रहे कि पाँचों उँगलियाँ आपस में मिली हुई हों और कन्ष्कि उँगली का स्पर्श नाभि से होते रहना चाहिए।
    शरीर के पीछे की ओर यह चक्र पम्प का काम करता है, मूलाधार चक्र से उठने वाली सूक्ष्म ऊर्जा को ऊपर की ओर ढकेलता है साथ ही किडनी, एड्रीनल ग्रन्थियों एवं रक्तचाप को भी नियंत्रित करता है। इस चक्र के कमजोर पड़ जाने पर उच्च रक्त चाप, किडनी की व्याधियाँ, पीठ की तकलीफ एवं स्फूर्ति में भी कमी होने लगती है।
  4. अनाहत/हृदय चक्र (हार्ट चक्र, रंग-हरा)ः- हृदय चक्र विशुद्ध प्रेम और समस्त भावनाओं का केन्द्र है। र्निस्वार्थ आध्यात्मिक प्रेम को जन्म देता है। यह चक्र शरीर के आगे एवं पीछे दोनों ओर मध्य में स्थित है। शरीर के अग्र भाग में यह चक्र हृदय, थाइमस ग्रन्थि एवं संचालन विधि को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। मणीपुर चक्र पर जब व्यक्ति पर क्रोध, तनाव, नकारात्मक भावनाओं का दबाव पड़ता है तो उन्हें वह हृदय चक्र को भेज देता है। हृदय चक्र प्रभामंडल की शक्तिशाली नलिकाओं के द्वारा मणीपुर चक्र से जुड़ा हुआ है और हृदय संबंधी रोग व्याधियों के पूर्व मणिपुर चक्र का दोषपूर्ण होना अवश्यभावी है। शरीर के पिछले भाग पीठ के मध्य में पिछला हृदय चक्र स्थित है और यह विशेषकर फेफड़ों को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है और इस चक्र के दोषपूर्ण हो जाने पर दमा, टी.बी. एवं फेफड़ों से संबधित रोग – व्याध्यिाँ पनपने लगती है। हृदय चक्र पर सामने से रेकी देते समय हमें ध्यान रखना है कि हमारी दोनों हथेलियाँ हमारे सीने पर स्थित दानों निपिल्स (छपचचसमे) के मध्य होनी चाहिए।
  5. विशुद्ध चक्र (थरोट चक्र, रंग-हल्का नीला)ः- यह गले के मध्य में स्थित है। यह चक्र गला, थायरॉयड ग्रन्थि, पैरा-थाइरॉयड ग्रन्थि को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। ज्यातिषाचार्या के अनुसार यहां पर गुरू का वास है, जैसे माँ शिशु को केवल जन्म ही नहीं देती अपितु वह उसकी प्राथमिक गुरू भी है, शिशु को माँ से ही वाणी का बोध होता है। हमारे समस्त मनोभावों व विचारों का समावेश कण्ठ द्वारा वाणी के रूप में यहीं से प्रवाहित होता है। यह चक्र इसी लिए अति महत्त्वपूर्ण है।
    इस चक्र के कमजोर पड़ने से गले के रोग, टॉन्सिल, संचार क्रम में बाधा, कमजोर आवाज, हकलाने की शिकायत इत्यादि पैदा होती है।
  6. आज्ञा चक्र (थर्ड आई चक्र, रंग-गहरा नीला)ः- यह चक्र माथे पर दोनों भंवों के मध्य में स्थित है। यह चक्र पिट्युटरी, अन्तःस्रावित (इन्डोक्राइन ग्लैंडज़) एवं दिमाग को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। यह चक्र शरीर का ‘‘लाइट टावर’’ है और शरीर के अन्य सभी चक्रों, संबंधित स्रावित ग्रंथियों एवं प्रमुख अंगों को नियंत्रित एवं ऊर्जान्वित करता है। यह आँख एवं नाक की कार्य प्रणाली को प्रभावित करता है। इस चक्र के कमजोर पड़ने से स्रावित ग्रंन्थियों से संबंधित व्याधियाँ जैसे मधुमेह, अनपच इत्यादि हो जाते हैं। अतएव मधुमेह के रोग में मणीपुर चक्र के साथ आज्ञा चक्र पर भी देर तक रेकी दी जाये तो पूरा शरीर ऊर्जान्वित हो जाता है और अन्य चक्र भी क्रियाशील हो जाते हैं।
    यहां आध्यात्मिक ज्ञान, विकास या अनुभव के लिए ध्यान विकेन्द्रित किया जाता है।
  7. सहस्रार चक्र (क्राऊन चक्र रंग-बैंगनी):- यह चक्र सिर (चाेिट) के मध्य में स्थित है। यह चक्र पीनियल ग्रन्थि, दिमाग एवं पूरे शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। इस चक्र के द्वारा शरीर में अधिकतर प्राण का प्रवेश होता है।
    यदि एक भी चक्र विकारग्रसत या असंतुलित हो जाये तो उसका प्रभाव सभी चक्रों पर पड़ता है। हमारी आध्यात्मिक, मानसिक तथा शरीरक स्थिति इन चक्रों के आपसी संतुलन और सक्रियता पर निर्भर करती है।
    ज्ञान, प्रेम शक्ति और प्रेम-आनन्द की प्राप्ति, समाधि का अनुभव इस चक्र द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
    कुछ प्रमुख चक्र जैसे सहस्रार चक्र, आज्ञा चक्र और मणीपुर चक्र ऐसे चक्र हैं जहाँ यदि देर तक रेकी दी जाये तो शरीर के सभी चक्रों एवं अंगों को रेकी प्राप्त होती है, परन्तु संबंधित अंग के समीप के चक्र को रेकी देने पर प्राणशक्ति आसानी एवं तेजी से प्रभावित अंग में पहुँचती है। शरीर के छोटे, मध्यम एवं प्रमुख चक्र प्राणशक्ति के प्रवेश द्वार हैं। यदि शरीर के अंग से संबंधित चक्र के बदले प्रभावित अंग पर रेकी दी जाती है तो रेकी समीप के चक्र जो उसका प्रवेश द्वार है, उस ओर बढ़ती है एवं चक्र से प्रवेश कर प्रभावित अंग तक पहुँचती है इस प्रकार उपचार में विलम्ब के साथ अधिक देर तक रेकी देने की आवश्यकता पड़ती है। अगर पूर्ण शरीर को ऊजान्वित करना है तो सबसे सरल तरीका है मणीपुर चक्र को कुछ देर तक लगातार रेकी दी जाये, कारण, जहाँ यह चक्र शरीर के मध्य में स्थित है वहीं दूसरी ओर शरीर के अत्यंत महत्त्वपूर्ण अंग भी इस चक्र के समीप स्थित हैं।

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